1996 के पंच फैसला अधिनियम और पिछले अधिनियम के बीच अंतर

Last Updated at: July 20, 2020
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1996 के पंच फैसला अधिनियम और पिछले अधिनियम के बीच अंतर

पंचाट का अर्थ है किसी विवादित विषय पर पंचों द्वारा लिया गया निर्णय या फ़ैसला|  वह व्यक्ति, दल, जिसे  निर्णय देने का अधिकार प्राप्त होता है  और समूह और लोगो द्वारा मान्य होते है|  यहाँ विवाद का फैसला न्यायालय मे न होकर व्यक्ति या दल के लोग आपस मे एक वैचारिक सहमति से करते है|

1940 के मध्यस्थता या पंच फैसला अधिनियम (The Arbitration Act) और 1996 के मध्यस्थता अधिनियम के बीच मूलभूत अंतर यह है कि 1940 का मध्यस्थता अधिनियम 1934 के अंग्रेजी पंचाट अधिनियम पर आधारित था जो ब्रिटिश के शासन काल  में प्रभावशाली था। 1940 के मध्यस्थता अधिनियम को 1996 के मध्यस्थता अधिनियम द्वारा इसमे परिवर्तन कर दिया गया है। 1996 का मध्यस्थता अधिनियम UNCITRAL  (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून पर संयुक्त राष्ट्र आयोग) पर आधारित है। भारत में पंचाट कानून के संदर्भ ( reference) में नए अधिनियम के कारण  1908 के नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC ) में संशोधन किया गया था और एस 89 को इसमें पेश (submitted) किया गया था। सीपीसी के एस 89 (1) के अनुसार  अदालतों के बाहर विवादों को निपटाने के लिए पार्टियों के लिए एक उपलब्ध विकल्प है। यह केवल विवाद का सामना कर रही पार्टियों की सहमति से ही किया जा सकता है।

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पंचाट का अर्थ है किसी विवादित विषय पर पंचों द्वारा लिया गया निर्णय या फ़ैसला|  वह व्यक्ति, दल, जिसे  निर्णय देने का अधिकार प्राप्त होता है  और समूह और लोगो द्वारा मान्य होते है|  यहाँ विवाद का फैसला न्यायालय मे न होकर व्यक्ति या दल के लोग आपस मे एक वैचारिक सहमति से करते है|

1940 के मध्यस्थता या पंच फैसला अधिनियम (The Arbitration Act) और 1996 के मध्यस्थता अधिनियम के बीच मूलभूत अंतर यह है कि 1940 का मध्यस्थता अधिनियम 1934 के अंग्रेजी पंचाट अधिनियम पर आधारित था जो ब्रिटिश के शासन काल  में प्रभावशाली था। 1940 के मध्यस्थता अधिनियम को 1996 के मध्यस्थता अधिनियम द्वारा इसमे परिवर्तन कर दिया गया है। 1996 का मध्यस्थता अधिनियम UNCITRAL  (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून पर संयुक्त राष्ट्र आयोग) पर आधारित है। भारत में पंचाट कानून के संदर्भ ( reference) में नए अधिनियम के कारण  1908 के नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC ) में संशोधन किया गया था और एस 89 को इसमें पेश (submitted) किया गया था। सीपीसी के एस 89 (1) के अनुसार  अदालतों के बाहर विवादों को निपटाने के लिए पार्टियों के लिए एक उपलब्ध विकल्प है। यह केवल विवाद का सामना कर रही पार्टियों की सहमति से ही किया जा सकता है।

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