भारत में आपसी सहमति से तलाक़ लेने की प्रक्रिया 

Last Updated at: March 27, 2020
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आपसी सहमति से तलाक़ लेना विवाह को रद्द करने का एक आसान कानूनी तरीक़ा है। आपसी सहमति आमतौर पर उसे कहा जाता है जब दोनों पक्ष शांतिपूर्ण तरीके से अलग होने को राजी हो जाएं। तलाक़ की मुख्य शर्त ही पति पत्नी की सहमति होती है। अगर दोनों में से कोई एक भी राज़ी नहीं होता है तो तलाक़ आपसी सहमति से नहीं दिया जा सकता है।

आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए पति-पत्नी को निर्वाह व्यय/भरण पोषण व बच्चों की निगरानी को लेकर आपसी सहमति बनानी होती है। कानून के अनुसार, भरण पोषण के लिए कोई तय सीमा नहीं है। यह पति पत्नी की वित्तीय स्थिति एवं अन्य कारकों से तय किया जाता है। बच्चों की निगरानी का ज़िम्मा दोनों पति पत्नी द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी को आधा आधा बांट कर या किसी एक के द्वारा बच्चों की देखभाल के ज़िम्मा ले कर तय किया जाता है। 

निचे आप देख सकते हैं हमारे महत्वपूर्ण सर्विसेज जैसे कि फ़ूड लाइसेंस के लिए कैसे अप्लाई करें, ट्रेडमार्क रेजिस्ट्रशन के लिए कितना वक़्त लगता है और उद्योग आधार रेजिस्ट्रेशन का क्या प्रोसेस है .

 

आपसी सहमति से तलाक कब दायर किया जाता है?

पति पत्नी को आपसी सहमति से विवाह विच्छेद दायर करने से पहले विवाह की तारीख से कम से कम एक साल तक प्रतीक्षा करनी होती है।

उन्हें साबित करना होता है कि वो याचिका दायर करने के एक साल या उससे भी ज़्यादा अवधि से एक साथ नहीं रह रहे हैं। उन्हें दिखाना होता है कि अलग रहने की अवधि के दौरान वे एक दूसरे के साथ पति पत्नी की तरह रहने में असमर्थ थे।

कहाँ दायर की जाए आपसी सहमति तलाक याचिका ?

तलाक याचिका उस ज़िले के पारिवारिक न्यायालय में दायर की जा सकती है जहां दोनों पति पत्नी रहते हों व जहां उनका वैवाहिक घर हो। 

भारत के विभिन्न धर्मों में तलाक की प्रक्रिया 

हर धर्म में तलाक संबंधित कानून अलग होते हैं। हिन्दू धर्म में (जिनमें बौद्ध, सिख, जैन इतियादी शामिल होते हैं) के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 का प्रावधान है। मुस्लिम धर्म में मुस्लिम महिला अधिनियम ( विवाह विच्छेद पर अधिकारों का संरक्षण)1986, निजी विवाह विच्छेद अधिनियम व विवाह भंग अधिनियम, 1939 का प्रावधान है। ईसाइयों ये लिए भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872 और भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम 1869 का प्रावधान हैं। पारसियों के लिए पारसी विवाह एवं विवाह विच्छेद अधिनियम 1936 का प्रावधान है। इसके अलावा एक अलग सेक्युलर कानून भी है जिसे स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 कहा जाता है।

कानूनी सलाह लें

कैसे दायर करें आपसी सहमति तलाक़ याचिका ? क्या होता है कोर्ट में?

आपसी सहमति तलाक याचिका एक शपथ पत्र की तरह होती है जो ज़िले के पारिवारिक न्यायालय में दायर की जाती है। याचिका दायर हो जाने के बाद पति व पत्नी दोनों का बयान दर्ज कर लिया जाता है। उसके बाद विवाह विच्छेद के मुआमले को छह माह के लिए स्थगित कर दिया जाता है। 

छह माह के बाद दोनों पति पत्नी को आपसी सहमति की पुष्टि करने वाला दूसरे प्रस्ताव बनाने के लिए दोबारा पारिवारिक न्यायालय में पेश होना होगा। न्यायालय में तलाक पर निर्णय केवल दूसरे प्रस्ताव के बाद ही लिया जाता है। दूसरे प्रस्ताव में आपसी सहमति की पुष्टि किये बिना तलाक का प्रस्ताव मंज़ूर नहीं किया जाता। 

अगर पारिवारिक न्यायालय में दायर करने के बाद दोनों में से कोई एक पक्ष आपसी सहमति याचिका वापस ले ले तो क्या किया जाए?

छह महीने की अवधि के दौरान जब विवाह विच्छेद याचिका न्यायालय में लंबित होती है तो पति पत्नी में से कोई भी केवल एक आवेदन दायर करके न्यायालय के द्वारा याचिका को स्वीकार करने से पहले आपसी सहमति याचिका को वापस लेने के लिए अधिकृत है। 

ऐसे में न्यायालय विवाह विच्छेद के प्रस्ताव को रद्द कर देती है। 

ऐसी स्थिति में दूसरा साथी क्या करे ?

ऐसी स्थिति में दूसरे साथी के पास हिन्दू विवाह अधिनियम 1950 की धारा 13 के प्रावधानों के तहत विवाह विच्छेद की सामान्य याचिका दायर करने के अलावा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। 

ऐसी स्थिति में केवल कुछ विशिष्ट आधारों पर ही विवाह विच्छेद किया जा सकता है जैसे क्रूरता, किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वैच्छिक यौन संबंध, परित्याग, पति या पत्नी द्वारा धर्म परिवर्तन, पति या पत्नी का मानसिक रूप से विक्षिप्त होना, कुष्ठ रोग, यौन रोग, एक पति या पत्नी द्वारा दुनिया छोड़ देना या सात साल से ज़्यादा की अवधि के लिए लापता होना।  

न्यायालय में आपसी सहमति याचिका दायर करने से लेकर फ़ैसला होने तक कितना समय लग जाता है?

इसमें याचिका दायर करने की तारीख से छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है। यह केस व स्थान के आधार पर भिन्न होता है।

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भारत में आपसी सहमति से तलाक़ लेने की प्रक्रिया 

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आपसी सहमति से तलाक़ लेना विवाह को रद्द करने का एक आसान कानूनी तरीक़ा है। आपसी सहमति आमतौर पर उसे कहा जाता है जब दोनों पक्ष शांतिपूर्ण तरीके से अलग होने को राजी हो जाएं। तलाक़ की मुख्य शर्त ही पति पत्नी की सहमति होती है। अगर दोनों में से कोई एक भी राज़ी नहीं होता है तो तलाक़ आपसी सहमति से नहीं दिया जा सकता है।

आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए पति-पत्नी को निर्वाह व्यय/भरण पोषण व बच्चों की निगरानी को लेकर आपसी सहमति बनानी होती है। कानून के अनुसार, भरण पोषण के लिए कोई तय सीमा नहीं है। यह पति पत्नी की वित्तीय स्थिति एवं अन्य कारकों से तय किया जाता है। बच्चों की निगरानी का ज़िम्मा दोनों पति पत्नी द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी को आधा आधा बांट कर या किसी एक के द्वारा बच्चों की देखभाल के ज़िम्मा ले कर तय किया जाता है। 

निचे आप देख सकते हैं हमारे महत्वपूर्ण सर्विसेज जैसे कि फ़ूड लाइसेंस के लिए कैसे अप्लाई करें, ट्रेडमार्क रेजिस्ट्रशन के लिए कितना वक़्त लगता है और उद्योग आधार रेजिस्ट्रेशन का क्या प्रोसेस है .

 

आपसी सहमति से तलाक कब दायर किया जाता है?

पति पत्नी को आपसी सहमति से विवाह विच्छेद दायर करने से पहले विवाह की तारीख से कम से कम एक साल तक प्रतीक्षा करनी होती है।

उन्हें साबित करना होता है कि वो याचिका दायर करने के एक साल या उससे भी ज़्यादा अवधि से एक साथ नहीं रह रहे हैं। उन्हें दिखाना होता है कि अलग रहने की अवधि के दौरान वे एक दूसरे के साथ पति पत्नी की तरह रहने में असमर्थ थे।

कहाँ दायर की जाए आपसी सहमति तलाक याचिका ?

तलाक याचिका उस ज़िले के पारिवारिक न्यायालय में दायर की जा सकती है जहां दोनों पति पत्नी रहते हों व जहां उनका वैवाहिक घर हो। 

भारत के विभिन्न धर्मों में तलाक की प्रक्रिया 

हर धर्म में तलाक संबंधित कानून अलग होते हैं। हिन्दू धर्म में (जिनमें बौद्ध, सिख, जैन इतियादी शामिल होते हैं) के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 का प्रावधान है। मुस्लिम धर्म में मुस्लिम महिला अधिनियम ( विवाह विच्छेद पर अधिकारों का संरक्षण)1986, निजी विवाह विच्छेद अधिनियम व विवाह भंग अधिनियम, 1939 का प्रावधान है। ईसाइयों ये लिए भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872 और भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम 1869 का प्रावधान हैं। पारसियों के लिए पारसी विवाह एवं विवाह विच्छेद अधिनियम 1936 का प्रावधान है। इसके अलावा एक अलग सेक्युलर कानून भी है जिसे स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 कहा जाता है।

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कैसे दायर करें आपसी सहमति तलाक़ याचिका ? क्या होता है कोर्ट में?

आपसी सहमति तलाक याचिका एक शपथ पत्र की तरह होती है जो ज़िले के पारिवारिक न्यायालय में दायर की जाती है। याचिका दायर हो जाने के बाद पति व पत्नी दोनों का बयान दर्ज कर लिया जाता है। उसके बाद विवाह विच्छेद के मुआमले को छह माह के लिए स्थगित कर दिया जाता है। 

छह माह के बाद दोनों पति पत्नी को आपसी सहमति की पुष्टि करने वाला दूसरे प्रस्ताव बनाने के लिए दोबारा पारिवारिक न्यायालय में पेश होना होगा। न्यायालय में तलाक पर निर्णय केवल दूसरे प्रस्ताव के बाद ही लिया जाता है। दूसरे प्रस्ताव में आपसी सहमति की पुष्टि किये बिना तलाक का प्रस्ताव मंज़ूर नहीं किया जाता। 

अगर पारिवारिक न्यायालय में दायर करने के बाद दोनों में से कोई एक पक्ष आपसी सहमति याचिका वापस ले ले तो क्या किया जाए?

छह महीने की अवधि के दौरान जब विवाह विच्छेद याचिका न्यायालय में लंबित होती है तो पति पत्नी में से कोई भी केवल एक आवेदन दायर करके न्यायालय के द्वारा याचिका को स्वीकार करने से पहले आपसी सहमति याचिका को वापस लेने के लिए अधिकृत है। 

ऐसे में न्यायालय विवाह विच्छेद के प्रस्ताव को रद्द कर देती है। 

ऐसी स्थिति में दूसरा साथी क्या करे ?

ऐसी स्थिति में दूसरे साथी के पास हिन्दू विवाह अधिनियम 1950 की धारा 13 के प्रावधानों के तहत विवाह विच्छेद की सामान्य याचिका दायर करने के अलावा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। 

ऐसी स्थिति में केवल कुछ विशिष्ट आधारों पर ही विवाह विच्छेद किया जा सकता है जैसे क्रूरता, किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वैच्छिक यौन संबंध, परित्याग, पति या पत्नी द्वारा धर्म परिवर्तन, पति या पत्नी का मानसिक रूप से विक्षिप्त होना, कुष्ठ रोग, यौन रोग, एक पति या पत्नी द्वारा दुनिया छोड़ देना या सात साल से ज़्यादा की अवधि के लिए लापता होना।  

न्यायालय में आपसी सहमति याचिका दायर करने से लेकर फ़ैसला होने तक कितना समय लग जाता है?

इसमें याचिका दायर करने की तारीख से छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है। यह केस व स्थान के आधार पर भिन्न होता है।

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